
आजकल बच्चों के खिलौनों में सबसे ज्यादा मांग उन चीजों की है जो रोशनी करती हों, आवाज़ निकालती हों या बटन दबाते ही हिलने लगती हों। बाजार में ऐसे चमकदार और इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों की भरमार है, जिन्हें देखकर बच्चे तो आकर्षित होते ही हैं, माता-पिता भी इन्हें देखकर खुश हो जाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ये खिलौने बच्चों के मानसिक विकास पर क्या असर डालते हैं?
विशेषज्ञों की राय है कि लगातार तेज़ रोशनी, आवाज़ और स्वचालित हरकतों वाले खिलौने बच्चों के दिमाग को जरूरत से ज्यादा उत्तेजित करते हैं। इससे न केवल उनकी कल्पनाशक्ति पर असर पड़ता है, बल्कि ध्यान केंद्रित करने और संवाद करने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है।
बाल विकास विशेषज्ञ मानते हैं कि शुरुआती उम्र में बच्चों का दिमाग सबसे अधिक ग्रहणशील होता है। ऐसे में अगर उन्हें ऐसे खिलौनों के बीच पाला जाए जो खुद ही सबकुछ कर देते हैं—जैसे गाना गाना, हिलना-डुलना, रोशनी दिखाना—तो बच्चा केवल दर्शक बनकर रह जाता है। वह खुद से कुछ सोचने या करने की कोशिश नहीं करता।
एक मनोवैज्ञानिक डॉ. अंजलि मिश्रा कहती हैं कि “बच्चों को ऐसे माहौल की जरूरत होती है जहां वे अपनी कल्पना का इस्तेमाल कर सकें। जब सबकुछ खिलौना खुद कर देता है, तो बच्चा निष्क्रिय हो जाता है और उसकी सीखने की क्षमता धीमी पड़ने लगती है।”
यह भी देखा गया है कि ऐसे खिलौनों के अधिक उपयोग से बच्चों की भाषा सीखने की प्रक्रिया धीमी हो सकती है। जो खिलौना खुद ही बोलता है, वह बच्चे को बोलने का मौका नहीं देता। वहीं, पारंपरिक खिलौने—जैसे लकड़ी के ब्लॉक्स, मिट्टी, रंग-ब्रश या स्टोरी बुक्स—बच्चे को सोचने, संवाद करने और कल्पना करने के लिए प्रेरित करते हैं।
इसका असर उनके व्यवहार में भी दिखता है। जो बच्चे ज़्यादा समय इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों के साथ बिताते हैं, वे अक्सर कम समय तक किसी एक चीज़ पर ध्यान दे पाते हैं। वे जल्दी बोर हो जाते हैं और ज़्यादा उत्तेजना की आदत उन्हें चिड़चिड़ा भी बना सकती है।
तो सवाल उठता है कि फिर बच्चों के लिए कैसे खिलौने बेहतर हैं?
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि 0 से 3 साल तक के बच्चों को जितना हो सके, सरल, बिना बैटरी वाले और इमेजिनेशन को बढ़ावा देने वाले खिलौने दिए जाएं। जैसे लकड़ी के ब्लॉक्स, रोल प्ले टॉय (डॉक्टर किट, किचन सेट), किताबें, रंगों से खेलने के साधन और मिट्टी। ये चीजें न केवल बच्चे को आनंद देती हैं, बल्कि वह खुद कुछ नया सोचता, बोलता और बनाता भी है।
एक माँ ने अनुभव साझा करते हुए बताया, “जब मैंने अपने बेटे को सिर्फ म्यूजिक वाले खिलौने दिए थे, वो 5 मिनट में बोर हो जाता था। लेकिन जब उसे मिट्टी और ब्लॉक्स मिले, तो वह घंटों खेलता रहा और खुद कहानियाँ भी गढ़ने लगा।”
बच्चों को ऐसे वातावरण की ज़रूरत होती है जहां वे केवल मनोरंजन न करें, बल्कि उनका दिमाग भी सक्रिय रूप से काम करे। इसलिए माता-पिता को सजग रहना चाहिए और सोच-समझकर ऐसे खिलौने चुनने चाहिए जो बच्चे को सिखाएं, न कि सिर्फ बहलाएं।
चमकते-धमकते खिलौने जरूर लुभावने होते हैं, लेकिन बच्चों के दिमाग के लिए हमेशा सही नहीं। जितना हो सके, बच्चों को ऐसे टॉय दें जो उनके विकास, कल्पना और सीखने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाएं। आखिरकार, बचपन केवल खेलने का नहीं, सीखने और सोचने का भी समय है।