
सुप्रीम कोर्ट ने जमानत के बाद भी 28 दिन तक जेल में बंद रहे एक कैदी की रिहाई में देरी को गंभीर लापरवाही मानते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को ₹5 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने गाजियाबाद के प्रिंसिपल जिला जज को इस पूरे मामले की जांच का निर्देश दिया है।
क्या है पूरा मामला?
आफताब नाम के युवक को 3 जनवरी 2024 को गाजियाबाद के वेव सिटी थाने में आईपीसी की धारा 366 (नाबालिग लड़की के अपहरण) और यूपी अवैध धर्मांतरण निषेध कानून के तहत गिरफ्तार किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने 29 अप्रैल 2025 को आफताब को जमानत दे दी, लेकिन जेल से रिहाई 27 मई को हुई — यानी 28 दिन तक गैरकानूनी हिरासत में रहा।
कोर्ट में क्या हुआ?
सुप्रीम कोर्ट की अवकाशकालीन पीठ के जज केवी विश्वनाथन और एन कोटिश्वर सिंह ने इस मामले को गंभीर बताया और कहा:
“सिर्फ तकनीकी आधार पर किसी व्यक्ति की आज़ादी को रोका नहीं जा सकता। यह संविधान के खिलाफ है।”
यूपी सरकार की वकील गरिमा प्रसाद ने कोर्ट को बताया कि रिहाई आदेश में एक तकनीकी गलती — धारा 5(1) की जगह सिर्फ धारा 5 लिखा था — जिसके कारण रिहाई में देरी हुई।
इस पर जजों ने सख्त टिप्पणी की:
“अगर सुप्रीम कोर्ट के आदेश भी इस तरह रोके जाएंगे, तो समाज में क्या संदेश जाएगा?”
कोर्ट के आदेश:
- यूपी सरकार 27 जून तक ₹5 लाख मुआवजा पीड़ित को दे।
- मुआवजा राशि दोषी अधिकारियों से वसूली जा सकती है।
- गाजियाबाद जेल अधीक्षक और जेल महानिदेशक कोर्ट में उपस्थित रहें।
- मामले की जांच गाजियाबाद के जिला जज करेंगे।
- सभी जेल अधिकारियों को इस विषय में वीडियो कांफ्रेंसिंग से प्रशिक्षित किया जाएगा।
जांच में क्या देखा जाएगा?
- क्या रिहाई में हुई देरी सिर्फ तकनीकी कारण थी या किसी अधिकारी की दुर्भावना?
- क्या ऐसा आदेश भविष्य में दोबारा न हो — इसके लिए जेल महानिदेशक क्या कदम उठाएंगे?