
X बनाम भारत सरकार मामला इन दिनों पूरे देश में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। सवाल ये है कि क्या अब सोशल मीडिया पर सरकार की सख्ती बढ़ने वाली है? क्या “Safe Harbour” जैसी धाराएं अब कंपनियों के लिए ‘अधिकार’ नहीं बल्कि ‘जिम्मेदारी’ बन जाएंगी?
एलन मस्क के स्वामित्व वाली सोशल मीडिया कंपनी X Corp (पूर्व में Twitter) ने हाल ही में भारत सरकार के कुछ निर्देशों को कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनौती दी है। इस याचिका के जवाब में केंद्र सरकार ने एक अहम हलफनामा दायर कर सोशल मीडिया और इंटरनेट के बढ़ते प्रभाव को लेकर कई गंभीर तर्क रखे हैं।
सरकार का स्पष्ट रुख: सोशल मीडिया अब ‘सिर्फ माध्यम’ नहीं
सरकार का कहना है कि अब सोशल मीडिया केवल संवाद का जरिया नहीं रहा, बल्कि यह समाज को प्रभावित करने वाला एक ताकतवर उपकरण बन चुका है। इंटरनेट और प्लेटफॉर्म्स की ताकत इतनी बढ़ गई है कि एक झूठी या भड़काऊ पोस्ट चंद मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकती है।
सरकार के मुख्य तर्क:
- इंटरनेट की पहुंच पहले के मुकाबले कई गुना बढ़ चुकी है। आज देश में 97 करोड़ से ज्यादा यूजर्स इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं।
- सोशल मीडिया केवल ‘होस्ट’ नहीं करता, बल्कि वह कंटेंट को प्रमोट करता है, उसकी रैंकिंग तय करता है, और इससे समाज पर सीधा असर पड़ता है।
- Safe Harbour (IT Act की धारा 79) अब कोई अंधाधुंध छूट नहीं, बल्कि एक जवाबदेही भरी सुविधा होनी चाहिए।
- सरकार ने बताया कि 2024 में अब तक 22 लाख से ज्यादा साइबर क्राइम के मामले सामने आ चुके हैं — जो चिंता का विषय है।
- धारा 69A के तहत सरकार को अधिकार है कि वह अवैध या देशविरोधी कंटेंट को ब्लॉक कर सके।
- X जैसे प्लेटफॉर्म्स पर चलने वाले एल्गोरिदम पारदर्शी नहीं हैं, जो कई बार नफरत, अफवाह और हिंसा को बढ़ावा देते हैं।
- सुप्रीम कोर्ट भी यह मान चुका है कि सोशल मीडिया के दुरुपयोग से लोकतंत्र को खतरा हो सकता है।
X Corp की याचिका: ‘सहयोग पोर्टल’ है अवैध?
X Corp का आरोप है कि भारत सरकार का ‘सहयोग पोर्टल’ एक समानांतर, गैरकानूनी कंटेंट ब्लॉकिंग सिस्टम है जो कानून की निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं करता।
कंपनी के मुख्य तर्क:
- यह पोर्टल Supreme Court के श्रेय सिंघल फैसले (2015) का उल्लंघन करता है।
- यह IT एक्ट की प्रक्रिया के बाहर जाकर सेंसरशिप को बढ़ावा देता है।
- कंपनी ने कोर्ट से अपील की है कि उन्हें पोर्टल पर कर्मचारी नियुक्त करने की बाध्यता से छूट दी जाए।
- उनका कहना है कि ऐसा करना उनके नीतियों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ है।
सरकार का जवाब: विदेशी कंपनियों को नहीं है मौलिक अधिकार का दावा
सरकार ने स्पष्ट किया कि X Corp भारत की नागरिक नहीं है, इसलिए उसे संविधान के अनुच्छेद 14, 19, और 21 जैसे मौलिक अधिकारों का दावा नहीं है।
Safe Harbour और सार्वजनिक सुरक्षा का संतुलन ज़रूरी
सरकार का यह भी तर्क है कि डिजिटल युग में ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ और ‘सार्वजनिक सुरक्षा’ के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। अगर कोई कंपनी भड़काऊ या अवैध सामग्री हटाने में लापरवाही करती है, तो उसे Safe Harbour का लाभ नहीं मिलना चाहिए।
क्या है ‘सहयोग पोर्टल’?
यह पोर्टल भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) द्वारा बनाया गया है, जिसका उद्देश्य है:
- कानून लागू करने वाली एजेंसियों और सोशल मीडिया कंपनियों के बीच रियल टाइम सहयोग।
- अवैध कंटेंट को जल्दी और पारदर्शी तरीके से हटाना।
- प्लेटफॉर्म्स को जिम्मेदार बनाना।
X बनाम भारत सरकार एक बड़ा मोड़ हो सकता है
यह मामला सिर्फ एक सोशल मीडिया कंपनी और सरकार के बीच का विवाद नहीं है, बल्कि यह डिजिटल स्वतंत्रता बनाम सार्वजनिक जिम्मेदारी के बीच की लड़ाई है। अदालत जो भी निर्णय दे, उसका असर पूरे सोशल मीडिया पर पड़ेगा — खासकर भारत जैसे लोकतांत्रिक और डिजिटल रूप से सक्रिय देश में।
इस केस से यह स्पष्ट हो गया है कि सोशल मीडिया की आज़ादी अब बग़ैर जिम्मेदारी के नहीं चल सकती। तकनीक जितनी ताकतवर हो रही है, उस पर नियंत्रण और पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरी हो गई है।